पीरियड्स हर महिला के जीवन का एक स्वाभाविक और नियमित हिस्सा होते हैं। आमतौर पर यह प्रक्रिया 3 से 7 दिनों तक चलती है और इसमें सीमित मात्रा में रक्तस्राव होना सामान्य माना जाता है। लेकिन जब यही ब्लीडिंग जरूरत से ज़्यादा हो जाए, लंबे समय तक चले या महिला को शारीरिक रूप से कमजोर करने लगे, तब यह केवल एक “नॉर्मल पीरियड” नहीं रह जाता, बल्कि शरीर की ओर से दिया गया एक गंभीर संकेत बन जाता है।
बहुत सी महिलाएं पीरियड में बहुत ज्यादा ब्लीडिंग को यह सोचकर अनदेखा कर देती हैं कि “हर बार ऐसा ही होता है” या “दर्द तो सहना ही पड़ता है।” समाज में यह धारणा इतनी गहरी बैठी हुई है कि महिलाएं अपनी तकलीफ को बोलने से भी कतराती हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि पीरियड में बहुत ज्यादा ब्लीडिंग होना शरीर में किसी गड़बड़ी का संकेत हो सकता है, जिसे समझना और समय पर पहचानना बेहद ज़रूरी है।
यह लेख आपको सिर्फ जानकारी नहीं देगा, बल्कि आपके शरीर को समझने में मदद करेगा। इसमें हम विस्तार से जानेंगे कि पीरियड में ज्यादा ब्लीडिंग आखिर क्यों होती है, इसके पीछे कौन-कौन से कारण ज़िम्मेदार हो सकते हैं और कब यह स्थिति चिंता का विषय बन जाती है।

“ज्यादा ब्लीडिंग” का मतलब क्या होता है?
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि ज्यादा ब्लीडिंग आखिर किसे कहते हैं। हर महिला का शरीर अलग होता है, इसलिए पीरियड्स की मात्रा और अवधि भी अलग-अलग हो सकती है। लेकिन कुछ संकेत ऐसे होते हैं जो बताते हैं कि ब्लीडिंग सामान्य से ज्यादा है।
अगर आपको हर 1–2 घंटे में पैड या टैम्पून बदलना पड़ रहा है, अगर रात में भी बार-बार उठकर पैड बदलना पड़ता है, अगर 7 दिनों से ज़्यादा समय तक ब्लीडिंग जारी रहती है, या अगर खून के बड़े-बड़े थक्के (clots) निकलते हैं — तो यह हेवी पीरियड ब्लीडिंग का संकेत हो सकता है।
इसके साथ-साथ अगर पीरियड्स के दौरान बहुत ज्यादा थकान, चक्कर आना, सांस फूलना या कमजोरी महसूस हो, तो यह इस बात की ओर इशारा करता है कि शरीर जरूरत से ज्यादा खून खो रहा है।
ज्यादा ब्लीडिंग शरीर को कैसे प्रभावित करती है?
लगातार या बहुत ज्यादा ब्लीडिंग का सबसे पहला असर शरीर की ऊर्जा पर पड़ता है। खून के साथ-साथ शरीर आयरन भी खो देता है, जिससे धीरे-धीरे एनीमिया (खून की कमी) होने लगती है। एनीमिया के कारण महिला हमेशा थकी-थकी महसूस करती है, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी होती है और इम्युनिटी भी कमजोर पड़ने लगती है।
इसके अलावा ज्यादा ब्लीडिंग मानसिक रूप से भी परेशान करती है। हर महीने इस डर में रहना कि “इस बार फिर ज्यादा खून आएगा” या “कहीं बाहर जाना मुश्किल न हो जाए” — यह सब तनाव और चिंता को जन्म देता है। इसलिए यह समस्या केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़ी हुई है।
कारण 1: हार्मोनल असंतुलन – सबसे आम लेकिन अनदेखा कारण

पीरियड्स पूरी तरह हार्मोन पर निर्भर होते हैं। शरीर में मुख्य रूप से दो हार्मोन — एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन — पीरियड्स को नियंत्रित करते हैं। जब इन दोनों के बीच संतुलन बिगड़ जाता है, तब गर्भाशय की अंदरूनी परत जरूरत से ज्यादा मोटी हो जाती है।
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जब यह मोटी परत पीरियड्स के दौरान बाहर निकलती है, तो स्वाभाविक रूप से ब्लीडिंग भी ज्यादा होती है। हार्मोनल असंतुलन अक्सर किशोरावस्था, प्रेग्नेंसी के बाद, या 40 की उम्र के बाद ज्यादा देखने को मिलता है। इसके अलावा तनाव, नींद की कमी और गलत लाइफस्टाइल भी हार्मोन को बिगाड़ने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
कई महिलाएं यह समझ ही नहीं पातीं कि उनकी समस्या की जड़ हार्मोन हैं, और वे सिर्फ ब्लीडिंग पर ध्यान देती रहती हैं, कारण पर नहीं।
कारण 2: PCOD और PCOS – आज की सबसे आम समस्या

आज के समय में PCOD और PCOS महिलाओं में तेजी से बढ़ रही समस्याएं हैं। इन स्थितियों में ओवरी ठीक से काम नहीं कर पाती, जिससे ओव्यूलेशन अनियमित हो जाता है। जब लंबे समय तक ओव्यूलेशन नहीं होता, तब गर्भाशय की परत लगातार मोटी होती जाती है।
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जब आखिरकार पीरियड आता है, तो वह बहुत ज्यादा ब्लीडिंग के साथ आता है। कई बार यह ब्लीडिंग 8–10 दिनों तक भी चल सकती है। इसके साथ वजन बढ़ना, चेहरे पर बाल आना, मुंहासे और पीरियड्स का अनियमित होना भी आम लक्षण होते हैं।
PCOS से जुड़ी ब्लीडिंग को नजरअंदाज करना भविष्य में फर्टिलिटी से जुड़ी समस्याओं को जन्म दे सकता है।
कारण 3: यूटेराइन फाइब्रॉएड – गर्भाशय में बनने वाली गांठें

यूटेराइन फाइब्रॉएड गर्भाशय में बनने वाली गैर-कैंसरयुक्त गांठें होती हैं। ये बहुत आम हैं, लेकिन कई बार बिना किसी लक्षण के भी मौजूद रह सकती हैं। जब ये गांठें गर्भाशय की दीवार को प्रभावित करती हैं, तब पीरियड्स के दौरान ब्लीडिंग बढ़ जाती है।
फाइब्रॉएड के कारण पीरियड्स लंबे हो सकते हैं, खून के बड़े-बड़े थक्के निकल सकते हैं और पेट में भारीपन महसूस हो सकता है। कुछ महिलाओं को कमर और पेट के निचले हिस्से में लगातार दर्द भी रहता है।
फाइब्रॉएड का पता आमतौर पर अल्ट्रासाउंड से चलता है, और समय पर पहचान होने पर इसका इलाज संभव है।
कारण 4: एंडोमेट्रियोसिस – जब अंदर की परत गलत जगह पहुंच जाए

एंडोमेट्रियोसिस एक ऐसी स्थिति है जिसमें गर्भाशय की अंदरूनी परत जैसी कोशिकाएं गर्भाशय के बाहर बढ़ने लगती हैं। ये कोशिकाएं भी हर महीने हार्मोन के प्रभाव में सूजती और खून बहाती हैं, लेकिन क्योंकि वे बाहर होती हैं, इसलिए यह खून बाहर नहीं निकल पाता।
इस वजह से शरीर के अंदर सूजन, दर्द और ज्यादा ब्लीडिंग जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। एंडोमेट्रियोसिस में पीरियड्स बेहद दर्दनाक हो सकते हैं और ब्लीडिंग असामान्य रूप से ज्यादा हो सकती है।
यह समस्या अक्सर सालों तक पहचान में नहीं आती, क्योंकि महिलाएं दर्द को सामान्य समझकर सहती रहती हैं।
कारण 5: थायरॉइड की समस्या – छोटी ग्रंथि, बड़ा असर

थायरॉइड एक छोटी-सी ग्रंथि है, लेकिन इसका असर पूरे शरीर पर पड़ता है। थायरॉइड हार्मोन का असंतुलन पीरियड्स को भी गहराई से प्रभावित करता है। खासकर हाइपोथायरॉइडिज्म में पीरियड्स लंबे और ज्यादा ब्लीडिंग वाले हो सकते हैं।
इस स्थिति में शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है, वजन बढ़ता है, थकान बनी रहती है और पीरियड्स में असामान्य बदलाव देखने को मिलते हैं। कई महिलाएं बार-बार डॉक्टर के पास जाती हैं, लेकिन थायरॉइड टेस्ट नहीं करवातीं, जिससे समस्या जड़ से बनी रहती है।
कारण 6: गर्भनिरोधक साधन और दवाएं

कुछ महिलाओं में गर्भनिरोधक गोलियां, कॉपर-टी या हार्मोनल इंजेक्शन पीरियड ब्लीडिंग को प्रभावित कर सकते हैं। खासकर कॉपर-टी के शुरुआती महीनों में ब्लीडिंग ज्यादा होना एक आम समस्या है।
इसके अलावा ब्लड को पतला करने वाली दवाएं भी ब्लीडिंग को बढ़ा सकती हैं। अगर किसी महिला ने हाल ही में कोई नई दवा शुरू की है और उसके बाद पीरियड्स में बदलाव आया है, तो यह एक महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है।
कारण 7: उम्र से जुड़ा बदलाव और प्री-मेनोपॉज

40 की उम्र के बाद महिलाओं के शरीर में धीरे-धीरे मेनोपॉज की तैयारी शुरू हो जाती है। इस दौरान हार्मोनल उतार-चढ़ाव बहुत आम है। कभी पीरियड्स देर से आते हैं, कभी बहुत जल्दी, और कभी बहुत ज्यादा ब्लीडिंग के साथ।
प्री-मेनोपॉज के समय होने वाली हेवी ब्लीडिंग को अक्सर महिलाएं उम्र का असर समझकर अनदेखा कर देती हैं, जबकि कई बार इसके पीछे गंभीर कारण भी हो सकते हैं।
कब यह स्थिति चिंता का विषय बन जाती है?
हर बार ज्यादा ब्लीडिंग खतरनाक नहीं होती, लेकिन कुछ स्थितियों में डॉक्टर से मिलना बहुत ज़रूरी हो जाता है। अगर ब्लीडिंग इतनी ज्यादा हो कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी प्रभावित होने लगे, अगर हर महीने कमजोरी बढ़ती जाए, या अगर ब्लीडिंग के साथ तेज दर्द, बुखार या बदबूदार डिस्चार्ज हो — तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
समय पर जांच और सही इलाज न केवल समस्या को बढ़ने से रोकता है, बल्कि भविष्य में होने वाली जटिलताओं से भी बचाता है।
निष्कर्ष:
पीरियड में बहुत ज्यादा ब्लीडिंग कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे “नॉर्मल” कहकर सह लिया जाए। यह आपके शरीर का तरीका है आपको यह बताने का कि अंदर कुछ ठीक नहीं चल रहा। जितनी जल्दी आप इस संकेत को समझेंगी, उतनी जल्दी समाधान भी मिलेगा।
अपने शरीर से सवाल पूछना, जानकारी हासिल करना और ज़रूरत पड़ने पर मदद लेना — यह कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी की निशानी है। याद रखिए, स्वस्थ महिला ही एक मजबूत परिवार और समाज की नींव होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Disclaimer:
इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या की स्थिति में कृपया डॉक्टर या विशेषज्ञ से सलाह लें।
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